होम्योपैथिक डॉक्टर मरीज को दवा की पर्ची क्यों नहीं देते हैं?

"हम में से शायद ही कोई ऐसा होगा जिसने बचपन में वो सफेद छोटी-छोटी मीठी गोलियां न खाई हों। मम्मी के साथ होम्योपैथिक क्लिनिक जाना और डॉक्टर साहब का वो जादुई पिटारा देखना एक अलग ही अनुभव होता था। लेकिन एक सवाल जो बचपन से लेकर आज तक हम सबके मन में बना हुआ है— "आखिर होम्योपैथिक डॉक्टर पर्ची पर दवा का नाम क्यों नहीं लिखते?" आप चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, डॉक्टर अक्सर मुस्कुराकर बात टाल देते हैं या सिर्फ कोड वर्ड लिख देते हैं। क्या यह कोई 'सीक्रेट मिशन' है या इसके पीछे कोई ठोस वजह? चलिए, आज इस राज से पर्दा उठाते हैं!"

इसका एक नहीं, बल्कि अनेक कारण हैं-

Homeopathy Secrets

1.परंपरा:

डॉक्टर ही जब फार्मासिस्ट बन जाए ! एलोपैथी में डॉक्टर दवा लिखता है और आप मेडिकल स्टोर से खरीदते हैं। लेकिन होम्योपैथी में 'डिस्पेंसिंग फिजिशियन' की परंपरा है। यानी डॉक्टर खुद ही आपकी दवा तैयार करते है। पुराने समय से ही होम्योपैथी में दवा की शुद्धता और उसे बनाने के तरीके (जैसे गोलियों में लिक्विड डालना) पर बहुत जोर दिया गया है, इसलिए डॉक्टर इसे अपने सामने ही बनाना बेहतर समझते हैं।

2. आय का जरिया और बिजनेस मॉडल:

सीधी और साफ बात यह भी है कि कई क्लीनिकों में डॉक्टर की फीस दवा की कीमत में ही शामिल होती है। अगर डॉक्टर पर्ची पर दवा का नाम (जैसे Arnica या Nux Vomica) लिख दें, तो अगली बार मरीज डॉक्टर के पास जाने के बजाय सीधे स्टोर से ₹50-100 की शीशी खरीद लेगा। इससे डॉक्टर की प्रैक्टिस और आय पर सीधा असर पड़ता है। ​

3. 'सेल्फ-मेडिकेशन' का गंभीर खतरा:

होम्योपैथी में बिना सलाह के दवा दोहराना नुकसानदेह हो सकता है। गलत पोटेंसी (जैसे 30CH या 200CH) का चुनाव बीमारी को ठीक करने के बजाय उसे शरीर में और गहराई तक दबा सकता है। यह सबसे महत्वपूर्ण और वैज्ञानिक कारण है। होम्योपैथी में 'Drug Proving' नाम की एक चीज होती है। ​ नुकसान: अगर आप किसी सही दवा को बिना जरूरत लंबे समय तक लेते रहें, तो वह दवा आपके शरीर में नए लक्षण पैदा कर सकती है। ​

💡 प्रो-टिप: अगर आप रिकॉर्ड रखना चाहते हैं, तो डॉक्टर से बहस करने के बजाय प्यार से "Treatment Summary" मांगें। इमरजेंसी का हवाला देने पर वे अक्सर नाम लिख देते हैं!

4. पोटेंसी का खेल:

होम्योपैथी में 30C, 200C या 1M जैसी अलग-अलग पावर होती है। मरीज को लगता है कि उसे नाम पता है तो वह खुद डॉक्टर बन जाता है, जो कभी-कभी बीमारी को ठीक करने के बजाय उसे और दबा  देता है।

5.  सीक्रेट फॉर्मूला और कॉम्प्लेक्स:

कई अनुभवी डॉक्टर सालों के रिसर्च के बाद कुछ खास दवाओं का मिश्रण  तैयार करते हैं। वे इसे अपना 'ट्रेड सीक्रेट' मानते हैं। इसके अलावा, कई बार एक ही बोतल में 3-4 अलग-अलग दवाएं मिलाई जाती हैं, जिन्हें पर्ची पर समझाना और बाहर किसी दुकान पर मिलना नामुमकिन होता है।

6. मरीज का मनोविज्ञान :

होम्योपैथी में कई बार दवाएं मरीज के स्वभाव के आधार पर दी जाती हैं। मान लीजिए किसी को मानसिक तनाव के लिए ऐसी दवा दी गई जो आमतौर पर किसी अजीब लक्षण के लिए मशहूर है। अगर मरीज नाम पढ़कर गूगल करेगा, तो वह घबरा सकता है या उसका दवा पर से विश्वास उठ सकता है। और हम जानते हैं कि होम्योपैथी में 'विश्वास' इलाज का एक बड़ा हिस्सा है।

क्या कहता है भारत का कानून? कानूनी तौर पर देखा जाए तो नेशनल कमीशन फोर होम्योपैथी के नियमों और कन्जूमर प्रोटेक्शन एक्ट के अनुसार, हर मरीज को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उसे कौन सी दवा दी जा रही है। अगर आप रिकॉर्ड के लिए या किसी इमरजेंसी के लिए अपनी 'केस समरी' मांगते हैं, तो डॉक्टर उसे देने के लिए बाध्य हैं।

क्या केवल भारत में ही पर्ची नहीं देने की परंपरा है या पूरी दुनिया में यही हाल है? आइए जानते हैं-

1. भारतीय उपमहाद्वीप
​भारत के अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका में भी यही हाल है। यहाँ होम्योपैथी का "डिस्पेंसिंग मॉडल" (डॉक्टर द्वारा खुद दवा देना) इतना मजबूत है कि मरीज भी उम्मीद करता है कि उसे डॉक्टर के हाथ की बनी पुड़िया या शीशी मिले। यहाँ इसे 'पर्सनल टच' माना जाता है
​2. पश्चिमी देश (यूके, अमेरिका, जर्मनी)
​जर्मनी (होम्योपैथी का जन्मस्थान), इंग्लैंड और अमेरिका जैसे देशों में नियम काफी सख्त हैं:
​सेपरेशन ऑफ रोल: वहाँ डॉक्टर दवा लिखता है (Prescribe) और मरीज उसे एक स्पेशलाइज्ड होम्योपैथिक फार्मेसी (जैसे Helios या Nelson) से जाकर खरीदता है।
​पारदर्शिता: वहाँ के कानून इतने कड़े हैं कि डॉक्टर दवा का नाम छुपा ही नहीं सकता। मरीज को पता होता है कि वह क्या खा रहा है।
​ब्रांडेड दवाएं: विदेश में ज्यादातर 'पेटेंट' दवाएं (जैसे Boiron की Oscillococcinum) दुकानों पर सीधे मिलती हैं, इसलिए वहाँ छुपाने वाली बात कम होती है।
​3. यूरोप और दक्षिण अमेरिका (फ्रांस, ब्राजील आदि):
​फ्रांस और ब्राजील जैसे देशों में होम्योपैथी को मुख्यधारा की चिकित्सा के करीब माना जाता है। वहाँ डॉक्टर अक्सर पर्ची देते हैं ताकि मरीज इंश्योरेंस क्लेम कर सके। भारत में इंश्योरेंस वाला मामला अभी होम्योपैथी में उतना बड़ा नहीं हुआ है, इसलिए यहाँ पर्ची की 'फॉर्मेलिटी' कम होती है।
​भारत में यह परंपरा 'अमर' क्यों है?
​दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले भारत में इस परंपरा के टिके रहने के 3 खास कारण हैं:
​सुविधा: भारतीय मरीज चाहता है कि एक ही छत के नीचे डॉक्टर भी मिल जाए और दवा भी। अलग से फार्मेसी ढूंढना उसे सिरदर्द लगता है
​कीमत: भारत में होम्योपैथी को 'सस्ता इलाज' माना जाता है। डॉक्टर दवा के नाम पर ही अपनी फीस वसूल लेता है। अगर वह सिर्फ ₹500 फीस मांगे और दवा बाहर से लेने को कहे, तो कई भारतीय मरीज उसे "महंगा डॉक्टर" मानकर छोड़ देंगे।
​फार्मेसी की कमी: भारत के हर गली-कूचे में एलोपैथी की दुकानें हैं, लेकिन शुद्ध होम्योपैथिक फार्मेसी (जो हर पोटेंसी रखे) हर जगह नहीं मिलती। इसलिए डॉक्टर खुद स्टॉक रखना सुरक्षित समझते हैं।
निष्कर्ष: होम्योपैथी की उन मीठी गोलियों के पीछे का 'राज' दवा छुपाना नहीं, बल्कि सही तरीके से इलाज करना है। हालांकि, आज के डिजिटल युग में पारदर्शिता बढ़ रही है और कई नए डॉक्टर अब पर्ची देना शुरू कर चुके हैं।

आपकी क्या राय है?

आपको क्या लगता है डॉक्टरों को दवा का नाम बताना चाहिए या 'सस्पेंस' ही बेहतर है?
क्या आपको लगता है कि भारत में भी दवा लिखने का 'यूरोपीय सिस्टम' आना चाहिए?
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